श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति सञ्चिन्तयन् कृष्णं श्‍वफल्कतनयोऽध्वनि।✎ 1165

रथेन गोकुलं प्राप्तः सूर्यश्‍चास्तगिरिं नृप॥ २४

iti sañcintayan kṛṣṇaṃ śvaphalkatanayo'dhvani|

rathena gokulaṃ prāptaḥ sūryaścāstagiriṃ nṛpa|| 24

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! श्‍वफल्क-नन्दन अक्रूर मार्गमें इसी चिन्तनमें डूबे-डूबे रथसे नन्द-गाँव पहुँच गये और सूर्य अस्ताचलपर चले गये॥ २४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1165 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): संञ्च‌िन्तयन् → सञ्चिन्तयन्

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