श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

भगवद्दर्शनाह्लादबाष्पपर्याकुलेक्षणः ।

पुलकाचितांग औत्कण्ठ्यात् स्वाख्याने नाशकन् नृप॥ ३५

bhagavaddarśanāhlādabāṣpaparyākulekṣaṇaḥ |

pulakācitāṃga autkaṇṭhyāt svākhyāne nāśakan nṛpa|| 35

अर्थ

परीक्षित्! भगवान्‌के दर्शनसे उन्हें इतना आह्लाद हुआ कि उनके नेत्र आँसूसे सर्वथा भर गये। सारे शरीरमें पुलकावली छा गयी। उत्कण्ठावश गला भर आनेके कारण वे अपना नाम भी न बतला सके॥ ३५॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें