इसके बाद भगवान्ने अतिथि अक्रूरजीको एक गाय दी और पैर दबाकर उनकी थकावट दूर की तथा बड़े आदर एवं श्रद्धासे उन्हें पवित्र और अनेक गुणोंसे युक्त अन्नका भोजन कराया॥ ३९॥
निवेद्य गां चातिथये संवाह्य श्रान्तमादृतः।
अन्नं बहुगुणं मेध्यं श्रद्धयोपाहरद् विभुः॥ ३९
इसके बाद भगवान्ने अतिथि अक्रूरजीको एक गाय दी और पैर दबाकर उनकी थकावट दूर की तथा बड़े आदर एवं श्रद्धासे उन्हें पवित्र और अनेक गुणोंसे युक्त अन्नका भोजन कराया॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.38.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 372) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/38/39/