जब वे भोजन कर चुके, तब धर्मके परम मर्मज्ञ भगवान् बलरामजीने बड़े प्रेमसे मुखवास (पान-इलायची आदि) और सुगन्धित माला आदि देकर उन्हें अत्यन्त आनन्दित किया॥ ४०॥
तस्मै भुक्तवते प्रीत्या रामः परमधर्मवित्।
मुखवासैर्गन्धमाल्यैः परां प्रीतिं व्यधात् पुनः॥ ४०
जब वे भोजन कर चुके, तब धर्मके परम मर्मज्ञ भगवान् बलरामजीने बड़े प्रेमसे मुखवास (पान-इलायची आदि) और सुगन्धित माला आदि देकर उन्हें अत्यन्त आनन्दित किया॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.38.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 372) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/38/40/