इस प्रकार सत्कार हो चुकनेपर नन्दरायजीने उनके पास आकर पूछा—‘अक्रूरजी! आपलोग निर्दयी कंसके जीते-जी किस प्रकार अपने दिन काटते हैं? अरे! उसके रहते आपलोगोंकी वही दशा है जो कसाईद्वारा पाली हुई भेड़ोंकी होती है॥ ४१॥
पप्रच्छ सत्कृतं नन्दः कथं स्थ निरनुग्रहे।
कंसे जीवति दाशार्ह सौनपाला इवावयः॥ ४१
इस प्रकार सत्कार हो चुकनेपर नन्दरायजीने उनके पास आकर पूछा—‘अक्रूरजी! आपलोग निर्दयी कंसके जीते-जी किस प्रकार अपने दिन काटते हैं? अरे! उसके रहते आपलोगोंकी वही दशा है जो कसाईद्वारा पाली हुई भेड़ोंकी होती है॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.38.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 372) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/38/41/