श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

काश्‍चित्तत्कृतहृ१त्तापश्‍वासम्लानमुखश्रियः।

स्रंसद्दुकूलवलयकेशग्र२न्थ्यश्‍च काश्‍चन॥ १४

kāścittatkṛtahṛttāpaśvāsamlānamukhaśriyaḥ|

sraṃsaddukūlavalayakeśagranthyaśca kāścana|| 14

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णके मथुरा जानेकी बात सुनते ही बहुतोंके हृदयमें ऐसी जलन हुई कि गरम साँस चलने लगी, मुखकमल कुम्हला गया। और बहुतोंकी ऐसी दशा हुई—वे इस प्रकार अचेत हो गयीं कि उन्हें खिसकी हुई ओढ़नी, गिरते हुए कंगन और ढीले हुए जूड़ोंतकका पता न रहा॥ १४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    संतापाः श्‍वास०।

    (मुद्रित पृष्ठ 375)
  2. २

    बन्‍धाश्‍च।

    (मुद्रित पृष्ठ 375)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें