॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.39.15
अन्याश्च तदनुध्याननिवृत्ताशेषवृत्तयः।
नाभ्यजानन्निमं लोकमात्मलोकं गता इव॥ १५
anyāśca tadanudhyānanivṛttāśeṣavṛttayaḥ|
nābhyajānannimaṃ lokamātmalokaṃ gatā iva|| 15
अर्थ
भगवान्के स्वरूपका ध्यान आते ही बहुत-सी गोपियोंकी चित्तवृत्तियाँ सर्वथा निवृत्त हो गयीं, मानो वे समाधिस्थ—आत्मामें स्थित हो गयी हों, और उन्हें अपने शरीर और संसारका कुछ ध्यान ही न रहा॥ १५॥