श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

स्मरन्त्यश्‍चापराः शौरेरनुरागस्मितेरि३ताः।

हृदिस्पृशश्‍चित्रपदा गिरः संमुमुहुः स्त्रियः॥ १६

smarantyaścāparāḥ śaureranurāgasmiteritāḥ|

hṛdispṛśaścitrapadā giraḥ saṃmumuhuḥ striyaḥ|| 16

अर्थ

बहुत-सी गोपियोंके सामने भगवान् श्रीकृष्णका प्रेम, उनकी मन्द-मन्द मुसकान और हृदयको स्पर्श करनेवाली विचित्र पदोंसे युक्त मधुर वाणी नाचने लगी। वे उसमें तल्लीन हो गयीं। मोहित हो गयीं॥ १६॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    तेक्षणाः।

    (मुद्रित पृष्ठ 375)

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