श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

गतिं सुललितां चेष्टां स्निग्धहासावलोकनम्।

शोकापहानि नर्माणि प्रोद्दामचरितानि च॥ १७

gatiṃ sulalitāṃ ceṣṭāṃ snigdhahāsāvalokanam|

śokāpahāni narmāṇi proddāmacaritāni ca|| 17

अर्थ

गोपियाँ मन-ही-मन भगवान्‌की लटकीली चाल, भाव-भंगी, प्रेमभरी मुसकान, चितवन, सारे शोकोंको मिटा देनेवाली ठिठोलियाँ तथा उदारता-भरी लीलाओंका चिन्तन करने लगीं और उनके विरहके भयसे कातर हो गयीं। उनका हृदय, उनका जीवन—सब कुछ भगवान्‌के प्रति समर्पित था। उनकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे। वे झुंड-की-झुंड इकट्ठी होकर इस प्रकार कहने लगीं॥ १७-१८॥

यह अर्थ श्लोक 17–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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