॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.39.18
चिन्तयन्त्यो मुकुन्दस्य भीता विरहकातराः।
समेताः संघशः प्रोचुरश्रुमुख्योऽच्युताशयाः४॥ १८
cintayantyo mukundasya bhītā virahakātarāḥ|
sametāḥ saṃghaśaḥ procuraśrumukhyo'cyutāśayāḥ|| 18
अर्थ
गोपियाँ मन-ही-मन भगवान्की लटकीली चाल, भाव-भंगी, प्रेमभरी मुसकान, चितवन, सारे शोकोंको मिटा देनेवाली ठिठोलियाँ तथा उदारता-भरी लीलाओंका चिन्तन करने लगीं और उनके विरहके भयसे कातर हो गयीं। उनका हृदय, उनका जीवन—सब कुछ भगवान्के प्रति समर्पित था। उनकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे। वे झुंड-की-झुंड इकट्ठी होकर इस प्रकार कहने लगीं॥ १७-१८॥
टिप्पणियाँ
- ४
ताश्रयाः।