इसी समय अनुरागके रंगमें रँगी हुई गोपियाँ अपने प्राणप्यारे श्रीकृष्णके पास गयीं और उनकी चितवन, मुसकान आदि निरखकर कुछ-कुछ सुखी हुईं। अब वे अपने प्रियतम श्यामसुन्दरसे कुछ सन्देश पानेकी आकांक्षासे वहीं खड़ी हो गयीं॥ ३४॥✎ 889
गोप्यश्च दयितं कृष्णमनुव्रज्यानुरंजिताः।
प्रत्यादेशं भगवतः कांक्षन्त्यश्चावतस्थिरे॥ ३४
इसी समय अनुरागके रंगमें रँगी हुई गोपियाँ अपने प्राणप्यारे श्रीकृष्णके पास गयीं और उनकी चितवन, मुसकान आदि निरखकर कुछ-कुछ सुखी हुईं। अब वे अपने प्रियतम श्यामसुन्दरसे कुछ सन्देश पानेकी आकांक्षासे वहीं खड़ी हो गयीं॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.39.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 378) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/39/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)