श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

तास्तथा तप्यतीर्वीक्ष्य स्वप्रस्थाने यदूत्तमः।

सान्त्वयामास सप्रेमैरायास्य इति दौत्यकैः॥ ३५

tāstathā tapyatīrvīkṣya svaprasthāne yadūttamaḥ|

sāntvayāmāsa sapremairāyāsya iti dautyakaiḥ|| 35

अर्थ

यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि मेरे मथुरा जानेसे गोपियोंके हृदयमें बड़ी जलन हो रही है, वे सन्तप्त हो रही हैं, तब उन्होंने दूतके द्वारा ‘मैं आऊँगा’ यह प्रेम-सन्देश भेजकर उन्हें धीरज बँधाया॥ ३५॥✎ 889

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #889 शब्दोंके बीचका स्थान: आऊँगा’यह → आऊँगा’ यह

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें