श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

ता निराशा निववृतुर्गोविन्दविनिवर्तने।

विशोका अहनी निन्युर्गायन्त्यः प्रियचेष्टितम्॥ ३७

tā nirāśā nivavṛturgovindavinivartane|

viśokā ahanī ninyurgāyantyaḥ priyaceṣṭitam|| 37

अर्थ

अभी उनके मनमें आशा थी कि शायद श्रीकृष्ण कुछ दूर जाकर लौट आयें! परन्तु जब नहीं लौटे, तब वे निराश हो गयीं और अपने-अपने घर चली आयीं। परीक्षित्! वे रात-दिन अपने प्यारे श्यामसुन्दरकी लीलाओंका गान करती रहतीं और इस प्रकार अपने शोकसन्तापको हलका करतीं॥ ३७॥✎ 889

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #889 शब्दोंके बीचका स्थान: आऊँगा’यह → आऊँगा’ यह

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