शेषजीके हजार सिर हैं और प्रत्येक फणपर मुकुट सुशोभित है। कमलनालके समान उज्ज्वल शरीरपर नीलाम्बर धारण किये हुए हैं और उनकी ऐसी शोभा हो रही है, मानो सहस्र शिखरोंसे युक्त श्वेतगिरि कैलास शोभायमान हो॥ ४५॥✎ 14331434
सहस्रशिरसं देवं सहस्रफणमौलिनम्।
नीलाम्बरं बिसश्वेतं शृङ्गैः श्वेतमिव स्थितम्॥ ४५
शेषजीके हजार सिर हैं और प्रत्येक फणपर मुकुट सुशोभित है। कमलनालके समान उज्ज्वल शरीरपर नीलाम्बर धारण किये हुए हैं और उनकी ऐसी शोभा हो रही है, मानो सहस्र शिखरोंसे युक्त श्वेतगिरि कैलास शोभायमान हो॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.39.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 379) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/45/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1433 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रह्महृद) → ब्रह्मह्रद)