श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.4.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

स त्वहं त्यक्तकारुण्यस्त्यक्तज्ञातिसुहृत् खलः।

काँल्लोकान् वै गमिष्यामि ब्रह्महेव मृतः श्‍वसन्॥ १६

sa tvahaṃ tyaktakāruṇyastyaktajñātisuhṛt khalaḥ|

kām̐llokān vai gamiṣyāmi brahmaheva mṛtaḥ śvasan|| 16

अर्थ

मैं इतना दुष्ट हूँ कि करुणाका तो मुझमें लेश भी नहीं है । मैंने अपने भाई-बन्धु और हितैषियोंतकका त्याग कर दिया। पता नहीं, अब मुझे किस नरकमें जाना पड़ेगा। वास्तवमें तो मैं ब्रह्मघातीके समान जीवित होनेपर भी मुर्दा ही हूँ॥ १६॥

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