श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध) · अध्याय 4

46 श्लोक · 7 टिप्पणियाँ · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 145–150

श्लोक-सूची
पृष्ठ 145

श्रीशुक उवाच

बहिरन्तःपुरद्वारः सर्वाः पूर्ववदावृताः।

ततो बालध्वनिं श्रुत्वा गृहपालाः समुत्थिताः॥ १10.4.1

ते तु तूर्णमुपव्रज्य देवक्या गर्भजन्म तत्।

आचख्युर्भोजराजाय यदुद्वि‌ग्‍नः प्रतीक्षते॥ २10.4.2

स तल्पात् तूर्णमुत्थाय कालोऽयमिति विह्वलः।

सूतीगृहमगात् तूर्णं प्रस्खलन् मुक्तमूर्धजः॥ ३10.4.3

तमाह भ्रातरं देवी कृपणा करुणं सती।

स्नुषेयं तव कल्याण स्त्रियं मा हन्तुमर्हसि॥ ४10.4.4

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब वसुदेवजी लौट आये, तब नगरके बाहरी और भीतरी सब दरवाजे अपने-आप ही पहलेकी तरह बंद हो गये। इसके बाद नवजात शिशुके रोनेकी ध्वनि सुनकर द्वारपालोंकी नींद टूटी॥ १॥ वे तुरन्त भोजराज कंसके पास गये और देवकीको सन्तान होनेकी बात कही। कंस तो बड़ी आकुलता और घबराहटके साथ इसी बातकी प्रतीक्षा कर रहा था॥ २॥ द्वारपालोंकी बात सुनते ही वह झटपट पलँगसे उठ खड़ा हुआ और बड़ी शीघ्रतासे सूतिकागृहकी ओर झपटा। इस बार तो मेरे कालका ही जन्म हुआ है, यह सोचकर वह विह्वल हो रहा था और यही कारण है कि उसे इस बातका भी ध्यान न रहा कि उसके बाल बिखरे हुए हैं। रास्तेमें कई जगह वह लड़खड़ाकर गिरते-गिरते बचा॥ ३॥ बंदीगृहमें पहुँचनेपर सती देवकीने बड़े दुःख और करुणाके साथ अपने भाई कंससे कहा—‘मेरे हितैषी भाई! यह कन्या तो तुम्हारी पुत्रवधूके समान है। स्त्रीजातिकी है; तुम्हें स्त्रीकी हत्या कदापि नहीं करनी चाहिये॥ ४॥

पृष्ठ 146

बहवो हिंसिता भ्रातः शिशवः पावकोपमाः।

त्वया दैवनिसृष्टेन पुत्रिकैका प्रदीयताम्॥ ५10.4.5

नन्वहं ते ह्यवरजा दीना हतसुता प्रभो।

दातुमर्हसि मन्दाया अंगेमां चरमां प्रजाम्॥ ६10.4.6

पृष्ठ 146

भैया! तुमने दैववश मेरे बहुत-से अग्‍निके समान तेजस्वी बालक मार डाले। अब केवल यही एक कन्या बची है, इसे तो मुझे दे दो॥ ५॥ अवश्य ही मैं तुम्हारी छोटी बहिन हूँ। मेरे बहुत-से बच्चे मर गये हैं, इसलिये मैं अत्यन्त दीन हूँ। मेरे प्यारे और समर्थ भाई! तुम मुझ मन्दभागिनीको यह अन्तिम सन्तान अवश्य दे दो’॥ ६॥

पृष्ठ 145

श्रीशुक उवाच

उपगुह्यात्मजामेवं रुदत्या दीनदीनवत्।

याचितस्तां विनिर्भर्त्स्य हस्तादाचिच्छिदे खलः॥ ७10.4.7

तां गृहीत्वा चरणयोर्जातमात्रां स्वसुः सुताम्।

अपोथयच्छिलापृष्ठे स्वार्थोन्मूलितसौहृदः॥ ८10.4.8

सा तद्धस्तात् समुत्पत्य सद्यो देव्यम्बरं गता।

अदृश्यतानुजा विष्णोः सायुधाष्टमहाभुजा॥ ९10.4.9

दिव्यस्रगम्बरालेपरत्‍नाभरणभूषिता ।

धनुःशूलेषुचर्मासिशंखचक्रगदाधरा ॥ १०10.4.10

सिद्धचारणगन्धर्वैरप्सरःकिन्‍नरोरगैः ।

उपाहृतोरुबलिभिः स्तूयमानेदमब्रवीत्॥ ११10.4.11

किं मया हतया मन्द जातः खलु तवान्तकृत्।

यत्र क्व वा पूर्वशत्रुर्मा हिंसीः कृपणान् वृथा॥ १२10.4.12

इति प्रभाष्य तं देवी माया भगवती भुवि।

बहुनामनिकेतेषु बहुनामा बभूव ह॥ १३10.4.13

पृष्ठ 146

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कन्याको अपनी गोदमें छिपाकर देवकीजीने अत्यन्त दीनताके साथ रोते-रोते याचना की। परन्तु कंस बड़ा दुष्ट था। उसने देवकीजीको झिड़ककर उनके हाथसे वह कन्या छीन ली॥ ७॥ अपनी उस नन्हीं-सी नवजात भानजीके पैर पकड़कर कंसने उसे बड़े जोरसे एक चट्टानपर दे मारा। स्वार्थने उसके हृदयसे सौहार्दको समूल उखाड़ फेंका था॥ ८॥ परन्तु श्रीकृष्णकी वह छोटी बहिन साधारण कन्या तो थी नहीं, देवी थी; उसके हाथसे छूटकर तुरन्त आकाशमें चली गयी और अपने बड़े-बड़े आठ हाथोंमें आयुध लिये हुए दीख पड़ी॥ ९॥ वह दिव्य माला, वस्त्र, चन्दन और मणिमय आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके हाथोंमें धनुष, त्रिशूल, बाण, ढाल, तलवार, शंख, चक्र और गदा—ये आठ आयुध थे॥ १०॥ सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सरा, किन्‍नर और नागगण बहुत-सी भेंटकी सामग्री समर्पित करके उसकी स्तुति कर रहे थे । उस समय देवीने कंससे यह कहा—॥ ११॥ ‘रे मूर्ख! मुझे मारनेसे तुझे क्या मिलेगा? तेरे पूर्वजन्मका शत्रु तुझे मारनेके लिये किसी स्थानपर पैदा हो चुका है। अब तू व्यर्थ निर्दोष बालकोंकी हत्या न किया कर’॥ १२॥ कंससे इस प्रकार कहकर भगवती योगमाया वहाँसे अन्तर्धान हो गयीं और पृथ्वीके अनेक स्थानोंमें विभिन्‍न नामोंसे प्रसिद्ध हुईं॥ १३॥

तयाभिहितमाकर्ण्य कंसः परमविस्मितः।

देवकीं वसुदेवं च विमुच्य प्रश्रितोऽब्रवीत्॥ १४ 10.4.14

पृष्ठ 147

अहो भगिन्यहो भाम मया वां बत पाप्मना।

पुरुषाद इवापत्यं बहवो हिंसिताः सुताः॥ १५ 10.4.15

स त्वहं त्यक्तकारुण्यस्त्यक्तज्ञातिसुहृत् खलः।

काँल्लोकान् वै गमिष्यामि ब्रह्महेव मृतः श्‍वसन्॥ १६10.4.16

दैवमप्यनृतं वक्ति न मर्त्या एव केवलम्।

यद्विश्रम्भादहं पापः स्वसुर्निहतवाञ्छिशून्॥ १७10.4.17

मा शोचतं महाभागावात्मजान् स्वकृतम्भुजः।

जन्तवो न सदैकत्र दैवाधीनास्तदासते॥ १८10.4.18

भुवि भौमानि भूतानि यथा यान्त्यपयान्ति च।

नायमात्मा तथैतेषु विपर्येति यथैव भूः॥ १९10.4.19

देवीकी यह बात सुनकर कंसको असीम आश्‍चर्य हुआ। उसने उसी समय देवकी और वसुदेवको कैदसे छोड़ दिया और बड़ी नम्रतासे उनसे कहा—॥ १४॥ ‘मेरी प्यारी बहिन और बहनोईजी! हाय-हाय, मैं बड़ा पापी हूँ । राक्षस जैसे अपने ही बच्चोंको मार डालता है, वैसे ही मैंने तुम्हारे बहुत-से लड़के मार डाले। इस बातका मुझे बड़ा खेद है*॥ १५॥ मैं इतना दुष्ट हूँ कि करुणाका तो मुझमें लेश भी नहीं है । मैंने अपने भाई-बन्धु और हितैषियोंतकका त्याग कर दिया। पता नहीं, अब मुझे किस नरकमें जाना पड़ेगा। वास्तवमें तो मैं ब्रह्मघातीके समान जीवित होनेपर भी मुर्दा ही हूँ॥ १६॥ केवल मनुष्य ही झूठ नहीं बोलते, विधाता भी झूठ बोलते हैं । उसीपर विश्‍वास करके मैंने अपनी बहिनके बच्चे मार डाले। ओह! मैं कितना पापी हूँ॥ १७॥ तुम दोनों महात्मा हो। अपने पुत्रोंके लिये शोक मत करो। उन्हें तो अपने कर्मका ही फल मिला है। सभी प्राणी प्रारब्धके अधीन हैं। इसीसे वे सदा-सर्वदा एक साथ नहीं रह सकते॥ १८॥ जैसे मिट्टीके बने हुए पदार्थ बनते और बिगड़ते रहते हैं, परन्तु मिट्टीमें कोई अदल-बदल नहीं होती—वैसे ही शरीरका तो बनना-बिगड़ना होता ही रहता है; परन्तु आत्मापर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता॥ १९॥

यथानेवंविदो भेदो यत आत्मविपर्ययः।

देहयोगवियोगौ च संसृतिर्न निवर्तते॥ २०10.4.20

तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि।

मानुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः॥ २१10.4.21

यावद्धतोऽस्मि हन्तास्मीत्यात्मानं मन्यतेऽस्वदृक् १।

तावत्तदभिमान्यज्ञो बाध्यबाधकतामियात्॥ २२10.4.22

पृष्ठ 148

क्षमध्वं मम दौरात्म्यं साधवो दीन१वत्सलाः।

इत्युक्त्वाश्रुमुखः पादौ श्यालः स्वस्रोरथाग्रहीत्॥ २३10.4.23

मोच२यामास निगडाद् विश्रब्धः कन्यकागिरा।

देवकीं वसुदेवं च दर्शयन्‍नात्मसौहृदम्॥ २४10.4.24

भ्रातुः समनुतप्तस्य क्षान्त्वा रोषं च देवकी।

व्यसृजद् वसुदेवश्‍च प्रहस्य तमुवाच ह॥ २५10.4.25

एवमेतन्महाभाग३ यथा वदसि देहिनाम्।

अज्ञानप्रभवाहंधीः स्वपरेति भिदा यतः॥ २६10.4.26

शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विताः ।

मिथो घ्नन्तं न पश्यन्ति भावैर्भावं पृथग्दृशः॥ २७10.4.27

पृष्ठ 147

जो लोग इस तत्त्वको नहीं जानते, वे इस अनात्मा शरीरको ही आत्मा मान बैठते हैं। यही उलटी बुद्धि अथवा अज्ञान है। इसीके कारण जन्म और मृत्यु होते हैं। और जबतक यह अज्ञान नहीं मिटता, तबतक सुख-दुःखरूप संसारसे छुटकारा नहीं मिलता॥ २०॥ मेरी प्यारी बहिन! यद्यपि मैंने तुम्हारे पुत्रोंको मार डाला है, फिर भी तुम उनके लिये शोक न करो। क्योंकि सभी प्राणियोंको विवश होकर अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है॥ २१॥ अपने स्वरूपको न जाननेके कारण जीव जबतक यह मानता रहता है कि ‘मैं मारनेवाला हूँ या मारा जाता हूँ’, तबतक शरीरके जन्म और मृत्युका अभिमान करनेवाला वह अज्ञानी बाध्य और बाधक-भावको प्राप्त होता है। अर्थात् वह दूसरोंको दुःख देता है और स्वयं दुःख भोगता है॥ २२॥ मेरी यह दुष्टता तुम दोनों क्षमा करो; क्योंकि तुम बड़े ही साधुस्वभाव और दीनोंके रक्षक हो।’ ऐसा कहकर कंसने अपनी बहिन देवकी और वसुदेवजीके चरण पकड़ लिये। उसकी आँखोंसे आँसू बह-बहकर मुँहतक आ रहे थे॥ २३॥ इसके बाद उसने योगमायाके वचनोंपर विश्‍वास करके देवकी और वसुदेवको कैदसे छोड़ दिया और वह तरह-तरहसे उनके प्रति अपना प्रेम प्रकट करने लगा॥ २४॥ जब देवकीजीने देखा कि भाई कंसको पश्‍चात्ताप हो रहा है, तब उन्होंने उसे क्षमा कर दिया। वे उसके पहले अपराधोंको भूल गयीं और वसुदेवजीने हँसकर कंससे कहा—॥ २५॥ ‘मनस्वी कंस! आप जो कहते हैं, वह ठीक वैसा ही है। जीव अज्ञानके कारण ही शरीर आदिको ‘मैं’ मान बैठते हैं। इसीसे अपने परायेका भेद हो जाता है॥ २६॥ और यह भेददृष्टि हो जानेपर तो वे शोक, हर्ष, भय, द्वेष, लोभ, मोह और मदसे अन्धे हो जाते हैं। फिर तो उन्हें इस बातका पता ही नहीं रहता कि सबके प्रेरक भगवान् ही एक भावसे दूसरे भावका, एक वस्तुसे दूसरी वस्तुका नाश करा रहे हैं’॥ २७॥

पृष्ठ 148

श्रीशुक उवाच

कंस एवं प्रसन्‍नाभ्यां विशुद्धं प्रतिभाषितः।

देवकीवसुदेवाभ्यामनुज्ञातोऽविशद् गृहम्॥ २८10.4.28

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां कंस आहूय मन्त्रिणः।

तेभ्य आचष्ट तत् सर्वं यदुक्तं योगनिद्रया॥ २९10.4.29

आकर्ण्य भर्तुर्गदितं तमूचुर्देवशत्रवः।

देवान् प्रति कृतामर्षा दैतेया नातिकोविदाः॥ ३०10.4.30

एवं चेत्तर्हि भोजेन्द्र पुरग्रामव्रजादिषु।

अनिर्दशान् निर्दशांश्‍च हनिष्यामोऽद्य वै शिशून्॥ ३१ 10.4.31

पृष्ठ 149

किमुद्यमैः करिष्यन्ति देवाः समरभीरवः।

नित्यमुद्वि‌ग्‍नमनसो ज्याघोषैर्धनुषस्तव॥ ३२10.4.32

अस्यतस्ते शरव्रातैर्हन्यमानाः समन्ततः।

जिजीविषव उत्सृज्य पलायनपरा ययुः॥ ३३10.4.33

केचित् प्रांजलयो दीना न्यस्तशस्त्रा दिवौकसः।

मुक्तकच्छशिखाः केचिद् भीताः स्म इति वादिनः॥ ३४10.4.34

न त्वं विस्मृतशस्त्रास्त्रान् विरथान् भयसंवृतान्।

हंस्यन्यासक्तविमुखान् भ‌ग्‍नचापानयुध्यतः॥ ३५10.4.35

किं क्षेमशूरैर्विबुधैरसंयुगविकत्थनैः।

रहोजुषा किं हरिणा शम्भुना वा वनौकसा।

किमिन्द्रेणाल्पवीर्येण ब्रह्मणा वा तपस्यता॥ ३६10.4.36

तथापि देवाः सापत्‍न्यान्‍नोपेक्ष्या इति मन्महे।

ततस्तन्मूलखनने नियुङ्क्ष्वास्माननुव्रतान्॥ ३७10.4.37

यथाऽऽमयोऽङ्गे समुपेक्षितो नृभि-

र्न शक्यते रूढपदश्‍चिकित्सितुम्।

यथेन्द्रियग्राम उपेक्षितस्तथा

रिपुर्महान् बद्धबलो न चाल्यते॥ ३८10.4.38

मूलं हि विष्णुर्देवानां यत्र धर्मः सनातनः।

तस्य च ब्रह्म गोविप्रास्तपो यज्ञाः सदक्षिणाः॥ ३९10.4.39

पृष्ठ 150

तस्मात् सर्वात्मना राजन् ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिनः।

तपस्विनो यज्ञशीलान् गाश्‍च हन्मो हविर्दुघाः॥ ४०10.4.40

विप्रा गावश्‍च वेदाश्‍च१ तपः सत्यं दमः शमः।

श्रद्धा दया तितिक्षा च क्रतवश्‍च हरेस्तनूः॥ ४१10.4.41

स हि सर्वसुराध्यक्षो ह्यसुरद्विड् गुहाशयः।

तन्मूला देवताः सर्वाः सेश्‍वराः सचतुर्मुखाः।

अयं वै तद्वधोपायो यदृषीणां विहिंसनम्॥ ४२10.4.42

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब वसुदेव और देवकीने इस प्रकार प्रसन्‍न होकर निष्कपटभावसे कंसके साथ बातचीत की, तब उनसे अनुमति लेकर वह अपने महलमें चला गया॥ २८॥ वह रात्रि बीत जानेपर कंसने अपने मन्त्रियोंको बुलाया और योगमायाने जो कुछ कहा था, वह सब उन्हें कह सुनाया॥ २९॥ कंसके मन्त्री पूर्णतया नीतिनिपुण नहीं थे। दैत्य होनेके कारण स्वभावसे ही वे देवताओंके प्रति शत्रुताका भाव रखते थे। अपने स्वामी कंसकी बात सुनकर वे देवताओंपर और भी चिढ़ गये और कंससे कहने लगे—॥ ३०॥ ‘भोजराज! यदि ऐसी बात है तो हम आज ही बड़े-बड़े नगरोंमें, छोटे-छोटे गाँवोंमें, अहीरोंकी बस्तियोंमें और दूसरे स्थानोंमें जितने बच्चे हुए हैं, वे चाहे दस दिनसे अधिकके हों या कमके, सबको आज ही मार डालेंगे॥ ३१॥ समरभीरु देवगण युद्धोद्योग करके ही क्या करेंगे? वे तो आपके धनुषकी टंकार सुनकर ही सदा-सर्वदा घबराये रहते हैं॥ ३२॥ जिस समय युद्धभूमिमें आप चोट-पर-चोट करने लगते हैं, बाण-वर्षासे घायल होकर अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये समरांगण छोड़कर देवतालोग पलायन-परायण होकर इधर-उधर भाग जाते हैं॥ ३३॥ कुछ देवता तो अपने अस्त्र-शस्त्र जमीनपर डाल देते हैं और हाथ जोड़कर आपके सामने अपनी दीनता प्रकट करने लगते हैं। कोई-कोई अपनी चोटीके बाल तथा कच्छ खोलकर आपकी शरणमें आकर कहते हैं कि—‘हम भयभीत हैं, हमारी रक्षा कीजिये’॥ ३४॥ आप उन शत्रुओंको नहीं मारते जो अस्त्र-शस्त्र भूल गये हों, जिनका रथ टूट गया हो, जो डर गये हों, जो लोग युद्ध छोड़कर अन्यमनस्क हो गये हों, जिनका धनुष टूट गया हो या जिन्होंने युद्धसे अपना मुख मोड़ लिया हो—उन्हें भी आप नहीं मारते॥ ३५॥ देवता तो बस वहीं वीर बनते हैं, जहाँ कोई लड़ाई-झगड़ा न हो। रणभूमिके बाहर वे बड़ी-बड़ी डींग हाँकते हैं। उनसे तथा एकान्तवासी विष्णु, वनवासी शंकर, अल्पवीर्य इन्द्र और तपस्वी ब्रह्मासे भी हमें क्या भय हो सकता है॥ ३६॥ फिर भी देवताओंकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये—ऐसी हमारी राय है। क्योंकि हैं तो वे शत्रु ही। इसलिये उनकी जड़ उखाड़ फेंकनेके लिये आप हम-जैसे विश्‍वासपात्र सेवकोंको नियुक्त कर दीजिये॥ ३७॥ जब मनुष्यके शरीरमें रोग हो जाता है और उसकी चिकित्सा नहीं की जाती—उपेक्षा कर दी जाती है, तब रोग अपनी जड़ जमा लेता है और फिर वह असाध्य हो जाता है। अथवा जैसे इन्द्रियोंकी उपेक्षा कर देनेपर उनका दमन असम्भव हो जाता है, वैसे ही यदि पहले शत्रुकी उपेक्षा कर दी जाय और वह अपना पाँव जमा ले, तो फिर उसको हराना कठिन हो जाता है॥ ३८॥ देवताओंकी जड़ है विष्णु और वह वहाँ रहता है, जहाँ सनातनधर्म है। सनातनधर्मकी जड़ हैं—वेद, गौ, ब्राह्मण, तपस्या और वे यज्ञ, जिनमें दक्षिणा दी जाती है॥ ३९॥ इसलिये भोजराज! हमलोग वेदवादी ब्राह्मण, तपस्वी, याज्ञिक और यज्ञके लिये घी आदि हविष्य पदार्थ देनेवाली गायोंका पूर्णरूपसे नाश कर डालेंगे॥ ४०॥ ब्राह्मण, गौ, वेद, तपस्या, सत्य, इन्द्रियदमन, मनोनिग्रह, श्रद्धा, दया, तितिक्षा और यज्ञ विष्णुके शरीर हैं॥ ४१॥ वह विष्णु ही सारे देवताओंका स्वामी तथा असुरोंका प्रधान द्वेषी है। परन्तु वह किसी गुफामें छिपा रहता है। महादेव, ब्रह्मा और सारे देवताओंकी जड़ वही है। उसको मार डालनेका उपाय यह है कि ऋषियोंको मार डाला जाय’॥ ४२॥

श्रीशुक उवाच

एवं दुर्मन्त्रिभिः कंसः सह सम्मन्त्र्य दुर्मतिः।✎ 2058

ब्रह्महिंसां हितं२ मेने कालपाशावृतोऽसुरः॥ ४३10.4.43

सन्दिश्य साधुलोकस्य कदने कदनप्रियान्।

कामरूपधरान् दिक्षु दानवान् गृहमाविशत्॥ ४४10.4.44

ते वै रजःप्रकृतयस्तमसा मूढचेतसः।

सतां विद्वेषमाचेरुरारादागतमृत्यवः॥ ४५10.4.45

आयुः श्रियं यशो धर्मं लोकानाशिष एव च।

हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः॥ ४६10.4.46

पृष्ठ 150

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक तो कंसकी बुद्धि स्वयं ही बिगड़ी हुई थी; फिर उसे मन्त्री ऐसे मिले थे, जो उससे भी बढ़कर दुष्ट थे। इस प्रकार उनसे सलाह करके कालके फंदेमें फँसे हुए असुर कंसने यही ठीक समझा कि ब्राह्मणोंको ही मार डाला जाय॥ ४३॥ उसने हिंसाप्रेमी राक्षसोंको संतपुरुषोंकी हिंसा करनेका आदेश दे दिया। वे इच्छानुसार रूप धारण कर सकते थे। जब वे इधर-उधर चले गये, तब कंसने अपने महलमें प्रवेश किया॥ ४४॥ उन असुरोंकी प्रकृति थी रजोगुणी। तमोगुणके कारण उनका चित्त उचित और अनुचितके विवेकसे रहित हो गया था। उनके सिरपर मौत नाच रही थी। यही कारण है कि उन्होंने सन्तोंसे द्वेष किया॥ ४५॥ परीक्षित्! जो लोग महान् सन्त पुरुषोंका अनादर करते हैं, उनका वह कुकर्म उनकी आयु, लक्ष्मी, कीर्ति, धर्म, लोक-परलोक, विषय-भोग और सब-के-सब कल्याणके साधनोंको नष्ट कर देता है॥ ४६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    जिनके गर्भमें भगवान्‌ने निवास किया, जिन्हें भगवान्‌के दर्शन हुए, उन देवकी-वसुदेवके दर्शनका ही यह फल है कि कंसके हृदयमें विनय, विचार, उदारता आदि सद्गुणोंका उदय हो गया। परन्तु जबतक वह उनके सामने रहा तभीतक ये सद्गुण रहे। दुष्ट मन्त्रियोंके बीचमें जाते ही वह फिर ज्यों-का-त्यों हो गया!

    (मुद्रित पृष्ठ 147)
  2. १

    सुदृक्।

    (मुद्रित पृष्ठ 147)
  3. १

    बन्धुव०।

    (मुद्रित पृष्ठ 148)
  4. २

    क्षया०।

    (मुद्रित पृष्ठ 148)
  5. ३

    राज।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 148)
  6. १

    देवाश्‍च।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 150)
  7. २

    हितां।

    (मुद्रित पृष्ठ 150)

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