श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.4.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यथानेवंविदो भेदो यत आत्मविपर्ययः।

देहयोगवियोगौ च संसृतिर्न निवर्तते॥ २०

yathānevaṃvido bhedo yata ātmaviparyayaḥ|

dehayogaviyogau ca saṃsṛtirna nivartate|| 20

अर्थ

जो लोग इस तत्त्वको नहीं जानते, वे इस अनात्मा शरीरको ही आत्मा मान बैठते हैं। यही उलटी बुद्धि अथवा अज्ञान है। इसीके कारण जन्म और मृत्यु होते हैं। और जबतक यह अज्ञान नहीं मिटता, तबतक सुख-दुःखरूप संसारसे छुटकारा नहीं मिलता॥ २०॥

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