मेरी प्यारी बहिन! यद्यपि मैंने तुम्हारे पुत्रोंको मार डाला है, फिर भी तुम उनके लिये शोक न करो। क्योंकि सभी प्राणियोंको विवश होकर अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है॥ २१॥
तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि।
मानुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः॥ २१
मेरी प्यारी बहिन! यद्यपि मैंने तुम्हारे पुत्रोंको मार डाला है, फिर भी तुम उनके लिये शोक न करो। क्योंकि सभी प्राणियोंको विवश होकर अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 147) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/21/