श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.4.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यावद्धतोऽस्मि हन्तास्मीत्यात्मानं मन्यतेऽस्वदृक् १।

तावत्तदभिमान्यज्ञो बाध्यबाधकतामियात्॥ २२

yāvaddhato'smi hantāsmītyātmānaṃ manyate'svadṛk |

tāvattadabhimānyajño bādhyabādhakatāmiyāt|| 22

अर्थ

अपने स्वरूपको न जाननेके कारण जीव जबतक यह मानता रहता है कि ‘मैं मारनेवाला हूँ या मारा जाता हूँ’, तबतक शरीरके जन्म और मृत्युका अभिमान करनेवाला वह अज्ञानी बाध्य और बाधक-भावको प्राप्त होता है। अर्थात् वह दूसरोंको दुःख देता है और स्वयं दुःख भोगता है॥ २२॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    सुदृक्।

    (मुद्रित पृष्ठ 147)

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