॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.4.27
शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विताः ।
मिथो घ्नन्तं न पश्यन्ति भावैर्भावं पृथग्दृशः॥ २७
śokaharṣabhayadveṣalobhamohamadānvitāḥ |
mitho ghnantaṃ na paśyanti bhāvairbhāvaṃ pṛthagdṛśaḥ|| 27
अर्थ
और यह भेददृष्टि हो जानेपर तो वे शोक, हर्ष, भय, द्वेष, लोभ, मोह और मदसे अन्धे हो जाते हैं। फिर तो उन्हें इस बातका पता ही नहीं रहता कि सबके प्रेरक भगवान् ही एक भावसे दूसरे भावका, एक वस्तुसे दूसरी वस्तुका नाश करा रहे हैं’॥ २७॥