उन असुरोंकी प्रकृति थी रजोगुणी। तमोगुणके कारण उनका चित्त उचित और अनुचितके विवेकसे रहित हो गया था। उनके सिरपर मौत नाच रही थी। यही कारण है कि उन्होंने सन्तोंसे द्वेष किया॥ ४५॥
ते वै रजःप्रकृतयस्तमसा मूढचेतसः।
सतां विद्वेषमाचेरुरारादागतमृत्यवः॥ ४५
उन असुरोंकी प्रकृति थी रजोगुणी। तमोगुणके कारण उनका चित्त उचित और अनुचितके विवेकसे रहित हो गया था। उनके सिरपर मौत नाच रही थी। यही कारण है कि उन्होंने सन्तोंसे द्वेष किया॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 150) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/4/45/