श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.4.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं दुर्मन्त्रिभिः कंसः सह सम्मन्त्र्य दुर्मतिः।✎ 2058

ब्रह्महिंसां हितं२ मेने कालपाशावृतोऽसुरः॥ ४३

evaṃ durmantribhiḥ kaṃsaḥ saha sammantrya durmatiḥ|

brahmahiṃsāṃ hitaṃ mene kālapāśāvṛto'suraḥ|| 43

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक तो कंसकी बुद्धि स्वयं ही बिगड़ी हुई थी; फिर उसे मन्त्री ऐसे मिले थे, जो उससे भी बढ़कर दुष्ट थे। इस प्रकार उनसे सलाह करके कालके फंदेमें फँसे हुए असुर कंसने यही ठीक समझा कि ब्राह्मणोंको ही मार डाला जाय॥ ४३॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    हितां।

    (मुद्रित पृष्ठ 150)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2058 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): म्मन्त्रॺ दुर्म → म्मन्त्र्य दुर्म

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