जिस समय युद्धभूमिमें आप चोट-पर-चोट करने लगते हैं, बाण-वर्षासे घायल होकर अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये समरांगण छोड़कर देवतालोग पलायन-परायण होकर इधर-उधर भाग जाते हैं॥ ३३॥
अस्यतस्ते शरव्रातैर्हन्यमानाः समन्ततः।
जिजीविषव उत्सृज्य पलायनपरा ययुः॥ ३३
जिस समय युद्धभूमिमें आप चोट-पर-चोट करने लगते हैं, बाण-वर्षासे घायल होकर अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये समरांगण छोड़कर देवतालोग पलायन-परायण होकर इधर-उधर भाग जाते हैं॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 149) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/33/