॥ श्रीहरिः ॥
तां गृहीत्वा चरणयोर्जातमात्रां स्वसुः सुताम्।
अपोथयच्छिलापृष्ठे स्वार्थोन्मूलितसौहृदः॥ ८
tāṃ gṛhītvā caraṇayorjātamātrāṃ svasuḥ sutām|
apothayacchilāpṛṣṭhe svārthonmūlitasauhṛdaḥ|| 8
अर्थ
अपनी उस नन्हीं-सी नवजात भानजीके पैर पकड़कर कंसने उसे बड़े जोरसे एक चट्टानपर दे मारा। स्वार्थने उसके हृदयसे सौहार्दको समूल उखाड़ फेंका था॥ ८॥
तां गृहीत्वा चरणयोर्जातमात्रां स्वसुः सुताम्।
अपोथयच्छिलापृष्ठे स्वार्थोन्मूलितसौहृदः॥ ८
अपनी उस नन्हीं-सी नवजात भानजीके पैर पकड़कर कंसने उसे बड़े जोरसे एक चट्टानपर दे मारा। स्वार्थने उसके हृदयसे सौहार्दको समूल उखाड़ फेंका था॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 146) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/8/