श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कन्याको अपनी गोदमें छिपाकर देवकीजीने अत्यन्त दीनताके साथ रोते-रोते याचना की। परन्तु कंस बड़ा दुष्ट था। उसने देवकीजीको झिड़ककर उनके हाथसे वह कन्या छीन ली॥ ७॥
उपगुह्यात्मजामेवं रुदत्या दीनदीनवत्।
याचितस्तां विनिर्भर्त्स्य हस्तादाचिच्छिदे खलः॥ ७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कन्याको अपनी गोदमें छिपाकर देवकीजीने अत्यन्त दीनताके साथ रोते-रोते याचना की। परन्तु कंस बड़ा दुष्ट था। उसने देवकीजीको झिड़ककर उनके हाथसे वह कन्या छीन ली॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 146) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/4/7/