॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.40.12
तुभ्यं नमस्तेऽस्त्वविषक्तदृष्टये
सर्वात्मने सर्वधियां च साक्षिणे।
गुणप्रवाहोऽयमविद्यया कृतः
प्रवर्तते देवनृतिर्यगात्मसु॥ १२
tubhyaṃ namaste'stvaviṣaktadṛṣṭaye
sarvātmane sarvadhiyāṃ ca sākṣiṇe|
guṇapravāho'yamavidyayā kṛtaḥ
pravartate devanṛtiryagātmasu|| 12
अर्थ
परन्तु आप सर्वस्वरूप होनेपर भी उनके साथ लिप्त नहीं हैं। आपकी दृष्टि निर्लिप्त है, क्योंकि आप समस्त वृत्तियोंके साक्षी हैं। यह गुणोंके प्रवाहसे होनेवाली सृष्टि अज्ञानमूलक है और वह देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि समस्त योनियोंमें व्याप्त है; परन्तु आप उससे सर्वथा अलग हैं। इसलिये मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ १२॥