श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.40.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 40 · अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

भगवञ्जीवलोकोऽयं मोहितस्तव मायया।

अहंममेत्यसद्ग्राहो भ्राम्यते कर्मवर्त्मसु॥ २३

bhagavañjīvaloko'yaṃ mohitastava māyayā|

ahaṃmametyasadgrāho bhrāmyate karmavartmasu|| 23

अर्थ

भगवन्! ये सब-के-सब जीव आपकी मायासे मोहित हो रहे हैं और इस मोहके कारण ही ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ इस झूठे दुराग्रहमें फँसकर कर्मके मार्गोंमें भटक रहे हैं॥ २३॥

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