श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.40.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 40 · अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

अहं चात्मात्मजागारदारार्थस्वजनादिषु।

भ्रमामि स्वप्नकल्पेषु मूढः सत्यधिया विभो॥ २४

ahaṃ cātmātmajāgāradārārthasvajanādiṣu|

bhramāmi svapnakalpeṣu mūḍhaḥ satyadhiyā vibho|| 24

अर्थ

मेरे स्वामी! इसी प्रकार मैं भी स्वप्नमें दीखनेवाले पदार्थोंके समान झूठे देह-गेह, पत्‍नी-पुत्र और धन-स्वजन आदिको सत्य समझकर उन्हींके मोहमें फँस रहा हूँ और भटक रहा हूँ॥ २४॥

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