॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.40.28
सोऽहं तवाङ्घ्र्युपगतोऽस्म्यसतां दुरापं ✎ 1857 2099
तच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये।
पुंसो भवेद् यर्हि संसरणापवर्ग-
स्त्वय्यब्जनाभ सदुपासनया मतिः स्यात्॥ २८
so'haṃ tavāṅghryupagato'smyasatāṃ durāpaṃ
taccāpyahaṃ bhavadanugraha īśa manye|
puṃso bhaved yarhi saṃsaraṇāpavarga-
stvayyabjanābha sadupāsanayā matiḥ syāt|| 28
अर्थ
इस प्रकार भटकता हुआ मैं आपके उन चरण-कमलोंकी छत्रछायामें आ पहुँचा हूँ, जो दुष्टोंके लिये दुर्लभ हैं। मेरे स्वामी! इसे भी मैं आपका कृपाप्रसाद ही मानता हूँ। क्योंकि पद्मनाभ! जब जीवके संसारसे मुक्त होनेका समय आता है, तब सत्पुरुषोंकी उपासनासे चित्तवृत्ति आपमें लगती है॥ २८॥✎ 1671