श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवमुक्तो भगवता सोऽक्रूरो विमना इव।

पुरीं प्रविष्टः कंसाय कर्मावेद्य गृहं ययौ॥ १८

evamukto bhagavatā so'krūro vimanā iva|

purīṃ praviṣṭaḥ kaṃsāya karmāvedya gṛhaṃ yayau|| 18

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌के इस प्रकार कहनेपर अक्रूरजी कुछ अनमने-से हो गये। उन्होंने पुरीमें प्रवेश करके कंससे श्रीकृष्ण और बलरामके ले आनेका समाचार निवेदन किया और फिर अपने घर गये॥ १८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें