जब अक्रूरजीने देखा कि भगवान्का वह दिव्यरूप अन्तर्धान हो गया, तब वे जलसे बाहर निकल आये और फिर जल्दी-जल्दी सारे आवश्यक कर्म समाप्त करके रथपर चले आये। उस समय वे बहुत ही विस्मित हो रहे थे॥ २॥
सोऽपि चान्तर्हितं वीक्ष्य जलादुन्मज्ज्य सत्वरः।
कृत्वा चावश्यकं सर्वं विस्मितो रथमागमत्॥ २
जब अक्रूरजीने देखा कि भगवान्का वह दिव्यरूप अन्तर्धान हो गया, तब वे जलसे बाहर निकल आये और फिर जल्दी-जल्दी सारे आवश्यक कर्म समाप्त करके रथपर चले आये। उस समय वे बहुत ही विस्मित हो रहे थे॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.41.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 386) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/41/2/