श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

जुष्टेषु जालामुखरन्ध्रकुट्टिमे-

ष्वाविष्टपारावतबर्हिनादिताम् ।

संसिक्तरथ्यापणमार्गचत्वरां

प्रकीर्णमाल्यांकुरलाजतण्डुलाम्॥ २२

juṣṭeṣu jālāmukharandhrakuṭṭime-

ṣvāviṣṭapārāvatabarhināditām |

saṃsiktarathyāpaṇamārgacatvarāṃ

prakīrṇamālyāṃkuralājataṇḍulām|| 22

अर्थ

सुवर्णसे सजे हुए चौराहे, धनियोंके महल, उन्हींके साथके बगीचे, कारीगरोंके बैठनेके स्थान या प्रजावर्गके सभा-भवन (टाउनहाल) और साधारण लोगोंके निवासगृह नगरकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वैदूर्य, हीरे, स्फटिक (बिल्लौर), नीलम, मूँगे, मोती और पन्‍ने आदिसे जड़े हुए छज्जे, चबूतरे, झरोखे एवं फर्श आदि जगमगा रहे हैं। उनपर बैठे हुए कबूतर, मोर आदि पक्षी भाँति-भाँतिकी बोली बोल रहे हैं। सड़क, बाजार, गली एवं चौराहोंपर खूब छिड़काव किया गया है। स्थान-स्थानपर फूलोंके गजरे, जवारे (जौके अंकुर), खील और चावल बिखरे हुए हैं॥ २१-२२॥

यह अर्थ श्लोक 21–22 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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