श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

आपूर्णकुम्भैर्दधिचन्दनोक्षितैः

प्रसूनदीपावलिभिः सपल्लवैः ।

सवृन्दरम्भाक्रमुकैः सकेतुभिः

स्वलंकृतद्वारगृहां सपट्टिकैः॥ २३

āpūrṇakumbhairdadhicandanokṣitaiḥ

prasūnadīpāvalibhiḥ sapallavaiḥ |

savṛndarambhākramukaiḥ saketubhiḥ

svalaṃkṛtadvāragṛhāṃ sapaṭṭikaiḥ|| 23

अर्थ

घरोंके दरवाजोंपर दही और चन्दन आदिसे चर्चित जलसे भरे हुए कलश रखे हैं और वे फूल, दीपक, नयी-नयी कोंपलें फलसहित केले और सुपारीके वृक्ष, छोटी-छोटी झंडियों और रेशमी वस्त्रोंसे भलीभाँति सजाए हुए हैं॥ २३॥

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