भगवान्को देखकर सभी पुरवासी आपसमें कहने लगे—‘धन्य है! धन्य है!’ गोपियोंने ऐसी कौन-सी महान् तपस्या की है, जिसके कारण वे मनुष्यमात्रको परमानन्द देनेवाले इन दोनों मनोहर किशोरोंको देखती रहती हैं॥ ३१॥✎ 1930
ऊचुः पौरा अहो गोप्यस्तपः किमचरन् महत्।
या ह्येतावनुपश्यन्ति नरलोकमहोत्सवौ॥ ३१
भगवान्को देखकर सभी पुरवासी आपसमें कहने लगे—‘धन्य है! धन्य है!’ गोपियोंने ऐसी कौन-सी महान् तपस्या की है, जिसके कारण वे मनुष्यमात्रको परमानन्द देनेवाले इन दोनों मनोहर किशोरोंको देखती रहती हैं॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.41.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 390) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1930 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मत-वाले → मतवाले