श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

रजकं कंचिदायान्तं रंगकारं गदाग्रजः।

दृष्ट्वायाचत वासांसि धौतान्यत्युत्तमानि च॥ ३२

rajakaṃ kaṃcidāyāntaṃ raṃgakāraṃ gadāgrajaḥ|

dṛṣṭvāyācata vāsāṃsi dhautānyatyuttamāni ca|| 32

अर्थ

इसी समय भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि एक धोबी, जो कपड़े रँगनेका भी काम करता था, उनकी ओर आ रहा है। भगवान् श्रीकृष्णने उससे धुले हुए उत्तम-उत्तम कपड़े माँगे॥ ३२॥

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