श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

एवं विकत्थमानस्य कुपितो देवकीसुतः।

रजकस्य कराग्रेण शिरः कायादपातयत्॥ ३७

evaṃ vikatthamānasya kupito devakīsutaḥ|

rajakasya karāgreṇa śiraḥ kāyādapātayat|| 37

अर्थ

जब वह धोबी इस प्रकार बहुत कुछ बहक-बहककर बातें करने लगा, तब भगवान् श्रीकृष्णने तनिक कुपित होकर उसे एक तमाचा जमाया और उसका सिर धड़ामसे धड़से नीचे जा गिरा॥ ३७॥

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