श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.50

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

ताभिः स्वलंकृतौ प्रीतौ कृष्णरामौ सहानुगौ।

प्रणताय प्रपन्‍नाय ददतुर्वरदौ वरान्॥ ५०

tābhiḥ svalaṃkṛtau prītau kṛṣṇarāmau sahānugau|

praṇatāya prapannāya dadaturvaradau varān|| 50

अर्थ

जब ग्वालबाल और बलरामजीके साथ भगवान् श्रीकृष्ण उन सुन्दर-सुन्दर मालाओंसे अलंकृत हो चुके, तब उन वरदायक प्रभुने प्रसन्‍न होकर विनीत और शरणागत सुदामाको श्रेष्ठ वर दिये॥ ५०॥

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