नन्दबाबा आदि व्रज-वासी तो पहलेसे ही वहाँ पहुँच गये थे, और मथुरापुरीके बाहरी उपवनमें रुककर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे॥ ८॥✎ 1672
तावद् व्रजौकसस्तत्र नन्दगोपादयोऽग्रतः।
पुरोपवनमासाद्य प्रतीक्षन्तोऽवतस्थिरे॥ ८
नन्दबाबा आदि व्रज-वासी तो पहलेसे ही वहाँ पहुँच गये थे, और मथुरापुरीके बाहरी उपवनमें रुककर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.41.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 386) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/41/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)