‘सुन्दरी! तुम कौन हो? यह चन्दन किसके लिये ले जा रही हो? कल्याणि! हमें सब बात सच-सच बतला दो। यह उत्तम चन्दन, यह अंगराग हमें भी दो। इस दानसे शीघ्र ही तुम्हारा परम कल्याण होगा’॥ २॥
का त्वं वरोर्वेतदु हानुलेपनं
कस्यांगने वा कथयस्व साधु नः।
देह्यावयोरंगविलेपमुत्तमं
श्रेयस्ततस्ते नचिराद् भविष्यति॥ २
‘सुन्दरी! तुम कौन हो? यह चन्दन किसके लिये ले जा रही हो? कल्याणि! हमें सब बात सच-सच बतला दो। यह उत्तम चन्दन, यह अंगराग हमें भी दो। इस दानसे शीघ्र ही तुम्हारा परम कल्याण होगा’॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.42.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 393) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/42/2/