श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध) · अध्याय 42

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मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 392–397

श्लोक-सूची
पृष्ठ 392

श्रीशुक उवाच

अथ व्रजन् राजपथेन माधवः

स्त्रियं गृहीताङ्गविलेपभाजनाम्।

विलोक्य कुब्जां युवतीं वराननां

पप्रच्छ यान्तीं प्रहसन् रसप्रदः॥ १ 10.42.1

पृष्ठ 393

का त्वं वरोर्वेतदु हानुलेपनं

कस्यांगने वा कथयस्व साधु नः।

देह्यावयोरंगविलेपमुत्तमं

श्रेयस्ततस्ते नचिराद् भविष्यति॥ २10.42.2

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण जब अपनी मण्डलीके साथ राजमार्गसे आगे बढ़े, तब उन्होंने एक युवती स्त्रीको देखा। उसका मुँह तो सुन्दर था, परन्तु वह शरीरसे कुबड़ी थी। इसीसे उसका नाम पड़ गया था ‘कुब्जा’। वह अपने हाथमें चन्दनका पात्र लिये हुए जा रही थी। भगवान् श्रीकृष्ण प्रेमरसका दान करनेवाले हैं, उन्होंने कुब्जापर कृपा करनेके लिये हँसते हुए उससे पूछा—॥ १॥ ‘सुन्दरी! तुम कौन हो? यह चन्दन किसके लिये ले जा रही हो? कल्याणि! हमें सब बात सच-सच बतला दो। यह उत्तम चन्दन, यह अंगराग हमें भी दो। इस दानसे शीघ्र ही तुम्हारा परम कल्याण होगा’॥ २॥

पृष्ठ 393

सैरन्ध्र्युवाच✎ 2102

दास्यस्म्यहं सुन्दर कंससम्मता

त्रिवक्रनामा ह्यनुलेपकर्मणि।

मद्भावितं भोजपतेरतिप्रियं

विना युवां कोऽन्यतमस्तदर्हति॥ ३ 10.42.3

रूपपेशलमाधुर्यहसितालापवीक्षितैः ।

धर्षितात्मा ददौ सान्द्रमुभयोरनुलेपनम्॥ ४10.42.4

उबटन आदि लगानेवाली सैरन्ध्री कुब्जाने कहा—‘परम सुन्दर! मैं कंसकी प्रिय दासी हूँ। महाराज मुझे बहुत मानते हैं। मेरा नाम त्रिवक्रा (कुब्जा) है। मैं उनके यहाँ चन्दन, अंगराग लगानेका काम करती हूँ। मेरे द्वारा तैयार किये हुए चन्दन और अंगराग भोजराज कंसको बहुत भाते हैं। परन्तु आप दोनोंसे बढ़कर उसका और कोई उत्तम पात्र नहीं है’॥ ३॥ भगवान्‌के सौन्दर्य, सुकुमारता, रसिकता, मन्दहास्य, प्रेमालाप और चारु चितवनसे कुब्जाका मन हाथसे निकल गया। उसने भगवान्‌पर अपना हृदय न्योछावर कर दिया। उसने दोनों भाइयोंको वह सुन्दर और गाढ़ा अंगराग दे दिया॥ ४॥

ततस्तावङ्गरागेण स्ववर्णेतरशोभिना।

सम्प्राप्तपरभागेन शुशुभातेऽनुरञ्जितौ॥ ५10.42.5✎ 1169

प्रसन्‍नो भगवान् कुब्जां त्रिवक्रां रुचिराननाम्।

ऋज्वीं कर्तुं मनश्‍चक्रे दर्शयन् दर्शने फलम्॥ ६10.42.6

पद‍्भ्यामाक्रम्य प्रपदे द‍्व्यंगुल्युत्तानपाणिना।

प्रगृह्य चुबुकेऽध्यात्ममुदनीनमदच्युतः॥ ७10.42.7

सा तदर्जुसमानांगी बृहच्छ्रोणिपयोधरा।

मुकुन्दस्पर्शनात् सद्यो बभूव प्रमदोत्तमा॥ ८10.42.8

तब भगवान् श्रीकृष्णने अपने साँवले शरीरपर पीले रंगका और बलरामजीने अपने गोरे शरीरपर लाल रंगका अंगराग लगाया तथा नाभिसे ऊपरके भागमें अनुरंजित होकर वे अत्यन्त सुशोभित हुए॥ ५॥ भगवान् श्रीकृष्ण उस कुब्जापर बहुत प्रसन्‍न हुए। उन्होंने अपने दर्शनका प्रत्यक्ष फल दिखलानेके लिये तीन जगहसे टेढ़ी किन्तु सुन्दर मुखवाली कुब्जाको सीधी करनेका विचार किया॥ ६॥ भगवान्‌ने अपने चरणोंसे कुब्जाके पैरके दोनों पंजे दबा लिये और हाथ ऊँचा करके दो अँगुलियाँ उसकी ठोड़ीमें लगायीं तथा उसके शरीरको तनिक उचका दिया॥ ७॥ उचकाते ही उसके सारे अंग सीधे और समान हो गये। प्रेम और मुक्तिके दाता भगवान्‌के स्पर्शसे वह तत्काल विशाल नितम्ब तथा पीन पयोधरोंसे युक्त एक उत्तम युवती बन गयी॥ ८॥

ततो रूपगुणौदार्यसम्पन्‍ना प्राह केशवम्।

उत्तरीयान्तमाकृष्य स्मयन्ती जातहृच्छया॥ ९10.42.9

उसी क्षण कुब्जा रूप, गुण और उदारतासे सम्पन्‍न हो गयी। उसके मनमें भगवान्‌के मिलनकी कामना जाग उठी। उसने उनके दुपट्टेका छोर पकड़कर मुसकराते हुए कहा—॥ ९॥

पृष्ठ 394

एहि वीर गृहं यामो न त्वां त्यक्तुमिहोत्सहे।

त्वयोन्मथितचित्तायाः प्रसीद पुरुषर्षभ॥ १०10.42.10

एवं स्त्रिया याच्यमानः कृष्णो रामस्य पश्यतः।

मुखं वीक्ष्यानुगानां च प्रहसंस्तामुवाच ह॥ ११10.42.11

एष्यामि ते गृहं सुभ्रूः पुंसामाधिविकर्शनम्।

साधितार्थोऽगृहाणां नः पान्थानां त्वं परायणम्॥ १२10.42.12

विसृज्य माध्व्या वाण्या तां व्रजन् मार्गे वणिक्पथैः।

नानोपायनताम्बूलस्रग्गन्धैः साग्रजोऽर्चितः॥ १३10.42.13

तद्दर्शनस्मरक्षोभादात्मानं नाविदन् स्त्रियः।

विस्रस्तवासःकबरवलयालेख्यमूर्तयः ॥ १४10.42.14

पृष्ठ 394

‘वीरशिरोमणे! आइये, घर चलें । अब मैं आपको यहाँ नहीं छोड़ सकती। क्योंकि आपने मेरे चित्तको मथ डाला है। पुरुषोत्तम! मुझ दासीपर प्रसन्‍न होइये’॥ १०॥ जब बलरामजीके सामने ही कुब्जाने इस प्रकार प्रार्थना की, तब भगवान् श्रीकृष्णने अपने साथी ग्वालबालोंके मुँहकी ओर देखकर हँसते हुए उससे कहा—॥ ११॥ ‘सुन्दरी! तुम्हारा घर संसारी लोगोंके लिये अपनी मानसिक व्याधि मिटानेका साधन है। मैं अपना कार्य पूरा करके अवश्य वहाँ आऊँगा। हमारे-जैसे बेघरके बटोहियोंको तुम्हारा ही तो आसरा है’॥ १२॥ इस प्रकार मीठी-मीठी बातें करके भगवान् श्रीकृष्णने उसे विदा कर दिया। जब वे व्यापारियोंके बाजारमें पहुँचे, तब उन व्यापारियोंने उनका तथा बलरामजीका पान, फूलोंके हार, चन्दन और तरह-तरहकी भेंट—उपहारोंसे पूजन किया॥ १३॥ उनके दर्शनमात्रसे स्त्रियोंके हृदयमें प्रेमका आवेग, मिलनकी आकांक्षा जग उठती थी। यहाँतक कि उन्हें अपने शरीरकी भी सुध न रहती। उनके वस्त्र, जूड़े और कंगन ढीले पड़ जाते थे तथा वे चित्रलिखित मूर्तियोंके समान ज्यों-की-त्यों खड़ी रह जाती थीं॥ १४॥

ततः पौरान् पृच्छमानो धनुषः स्थानमच्युतः।

तस्मिन् प्रविष्टो ददृशे धनुरैन्द्रमिवाद्भुतम्॥ १५10.42.15✎ 1170

पुरुषैर्बहुभिर्गुप्तमर्चितं परमर्द्धिमत्।

वार्यमाणो नृभिः कृष्णः प्रसह्य धनुराददे॥ १६ 10.42.16

करेण वामेन सलीलमुद‍्धृतं

सज्यं च कृत्वा निमिषेण पश्यताम्।

नृणां विकृष्य प्रबभंज मध्यतो

यथेक्षुदण्डं मदकर्युरुक्रमः॥ १७ 10.42.17

धनुषो भज्यमानस्य शब्दः खं रोदसी दिशः।

पूरयामास यं श्रुत्वा कंसस्त्रासमुपागमत्॥ १८ 10.42.18

पृष्ठ 395

तद्रक्षिणः सानुचराः कुपिता आततायिनः।

ग्रहीतुकामा आवव्रुर्गृह्यतां बध्यतामिति॥ १९10.42.19

अथ तान् दुरभिप्रायान् विलोक्य बलकेशवौ।

क्रुद्धौ धन्वन आदाय शकले तांश्‍च जघ्नतुः॥ २०10.42.20

बलं च कंसप्रहितं हत्वा शालामुखात्ततः।

निष्क्रम्य चेरतुर्हृष्टौ निरीक्ष्य पुरसम्पदः॥ २१ 10.42.21

तयोस्तदद्भुतं वीर्यं निशाम्य पुरवासिनः।

तेजः प्रागल्भ्यं रूपं च मेनिरे विबुधोत्तमौ॥ २२ 10.42.22

तयोर्विचरतोः स्वैरमादित्योऽस्तमुपेयिवान्।

कृष्णरामौ वृतौ गोपैः पुराच्छकटमीयतुः॥ २३ 10.42.23

गोप्यो मुकुन्दविगमे विरहातुरा या

आशासताशिष ऋता मधुपुर्यभूवन्।

सम्पश्यतां पुरुषभूषणगात्रलक्ष्मीं

हित्वेतरान् नु भजतश्‍चकमेऽयनं श्रीः॥ २४10.42.24

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण पुरवासियोंसे धनुष-यज्ञका स्थान पूछते हुए रंगशालामें पहुँचे और वहाँ उन्होंने इन्द्रधनुषके समान एक अद्भुत धनुष देखा॥ १५॥ उस धनुषमें बहुत-सा धन लगाया गया था, अनेक बहुमूल्य अलंकारोंसे उसे सजाया गया था। उसकी खूब पूजा की गयी थी और बहुत-से सैनिक उसकी रक्षा कर रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णने रक्षकोंके रोकनेपर भी उस धनुषको बलात् उठा लिया॥ १६॥ उन्होंने सबके देखते-देखते उस धनुषको बायें हाथसे उठाया, उसपर डोरी चढ़ायी और एक क्षणमें खींचकर बीचो-बीचसे उसी प्रकार उसके दो टुकड़े कर डाले, जैसे बहुत बलवान् मतवाला हाथी खेल-ही-खेलमें ईखको तोड़ डालता है॥ १७॥ जब धनुष टूटा तब उसके शब्दसे आकाश, पृथ्वी और दिशाएँ भर गयीं; उसे सुनकर कंस भी भयभीत हो गया॥ १८॥ अब धनुषके रक्षक आततायी असुर अपने सहायकोंके साथ बहुत ही बिगड़े। वे भगवान् श्रीकृष्णको घेरकर खड़े हो गये और उन्हें पकड़ लेनेकी इच्छासे चिल्लाने लगे—‘पकड़ लो, बाँध लो, जाने न पावे’॥ १९॥ उनका दुष्ट अभिप्राय जानकर बलरामजी और श्रीकृष्ण भी तनिक क्रोधित हो गये और उस धनुषके टुकड़ोंको उठाकर उन्हींसे उनका काम तमाम कर दिया॥ २०॥ उन्हीं धनुषखण्डोंसे उन्होंने उन असुरोंकी सहायताके लिये कंसकी भेजी हुई सेनाका भी संहार कर डाला। इसके बाद वे यज्ञशालाके प्रधान द्वारसे होकर बाहर निकल आये और बड़े आनन्दसे मथुरापुरीकी शोभा देखते हुए विचरने लगे॥ २१॥ जब नगरनिवासियोंने दोनों भाइयोंके इस अद्भुत पराक्रमकी बात सुनी और उनके तेज, साहस तथा अनुपम रूपको देखा तब उन्होंने यही निश्‍चय किया कि हो-न-हो ये दोनों कोई श्रेष्ठ देवता हैं॥ २२॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी पूरी स्वतन्त्रतासे मथुरापुरीमें विचरण करने लगे। जब सूर्यास्त हो गया तब दोनों भाई ग्वालबालोंसे घिरे हुए नगरसे बाहर अपने डेरेपर, जहाँ छकड़े थे, लौट आये॥ २३॥ तीनों लोकोंके बड़े-बड़े देवता चाहते थे कि लक्ष्मी हमें मिलें, परन्तु उन्होंने सबका परित्याग कर दिया और न चाहनेवाले भगवान्‌का वरण किया। उन्हींको सदाके लिये अपना निवासस्थान बना लिया। मथुरावासी उन्हीं पुरुषभूषण भगवान् श्रीकृष्णके अंग-अंगका सौन्दर्य देख रहे हैं। उनका कितना सौभाग्य है! व्रजमें भगवान्‌की यात्राके समय गोपियोंने विरहातुर होकर मथुरावासियोंके सम्बन्धमें जो-जो बातें कही थीं, वे सब यहाँ अक्षरशः सत्य हुईं। सचमुच वे परमानन्दमें म‌ग्‍न हो गये॥ २४॥

अवनिक्ताङ्‌घ्रियुगलौ भुक्त्वा क्षीरोपसेचनम्।

ऊषतुस्तां सुखं रात्रिं ज्ञात्वा कंसचिकीर्षितम्॥ २५10.42.25

पृष्ठ 395

फिर हाथ-पैर धोकर श्रीकृष्ण और बलरामजीने दूधमें बने हुए खीर आदि पदार्थोंका भोजन किया और कंस आगे क्या करना चाहता है, इस बातका पता लगाकर उस रातको वहीं आरामसे सो गये॥ २५॥

कंसस्तु धनुषो भंगं रक्षिणां स्वबलस्य च।

वधं निशम्य गोविन्दरामविक्रीडितं परम्॥ २६ 10.42.26

पृष्ठ 396

दीर्घप्रजागरो भीतो दुर्निमित्तानि दुर्मतिः।

बहून्यचष्टोभयथा मृत्योर्दौत्यकराणि च॥ २७ 10.42.27

अदर्शनं स्वशिरसः प्रतिरूपे च सत्यपि।

असत्यपि द्वितीये च द्वैरूप्यं ज्योतिषां तथा॥ २८10.42.28

छिद्रप्रतीतिश्छायायां प्राणघोषानुपश्रुतिः।

स्वर्णप्रतीतिर्वृक्षेषु स्वपदानामदर्शनम्॥ २९10.42.29

स्वप्ने प्रेतपरिष्वंगः खरयानं विषादनम्।

यायान्‍नलदमाल्येकस्तैलाभ्यक्तो दिगम्बरः॥ ३०10.42.30

अन्यानि चेत्थंभूतानि स्वप्नजागरितानि च।

पश्यन् मरणसन्त्रस्तो निद्रां लेभे न चिन्तया॥ ३१10.42.31

जब कंसने सुना कि श्रीकृष्ण और बलरामने धनुष तोड़ डाला, रक्षकों तथा उनकी सहायताके लिये भेजी हुई सेनाका भी संहार कर डाला और यह सब उनके लिये केवल एक खिलवाड़ ही था—इसके लिये उन्हें कोई श्रम या कठिनाई नहीं उठानी पड़ी॥ २६॥ तब वह बहुत ही डर गया, उस दुर्बुद्धिको बहुत देरतक नींद न आयी। उसे जाग्रत्-अवस्थामें तथा स्वप्नमें भी बहुत-से ऐसे अपशकुन हुए जो उसकी मृत्युके सूचक थे॥ २७॥ जाग्रत्-अवस्थामें उसने देखा कि जल या दर्पणमें शरीरकी परछाईं तो पड़ती है, परन्तु सिर नहीं दिखायी देता; अँगुली आदिकी आड़ न होनेपर भी चन्द्रमा, तारे और दीपक आदिकी ज्योतियाँ उसे दो-दो दिखायी पड़ती हैं॥ २८॥ छायामें छेद दिखायी पड़ता है और कानोंमें अँगुली डालकर सुननेपर भी प्राणोंका घूँ-घूँ शब्द नहीं सुनायी पड़ता। वृक्ष सुनहले प्रतीत होते हैं और बालू या कीचड़में अपने पैरोंके चिह्न नहीं दीख पड़ते॥ २९॥ कंसने स्वप्नावस्थामें देखा कि वह प्रेतोंके गले लग रहा है, गधेपर चढ़कर चलता है और विष खा रहा है। उसका सारा शरीर तेलसे तर है, गलेमें जपाकुसुम (अड़हुल)-की माला है और न‌ग्‍न होकर कहीं जा रहा है॥ ३०॥ स्वप्न और जाग्रत्-अवस्थामें उसने इसी प्रकारके और भी बहुत-से अपशकुन देखे। उनके कारण उसे बड़ी चिन्ता हो गयी, वह मृत्युसे डर गया और उसे नींद न आयी॥ ३१॥

व्युष्टायां निशि कौरव्य सूर्ये चाद‍्भ्यः समुत्थिते।

कारयामास वै कंसो मल्लक्रीडामहोत्सवम्॥ ३२ 10.42.32

आनर्चुः पुरुषा रंगं तूर्यभेर्यश्‍च जघ्निरे।

मंचाश्‍चालंकृताः स्रग्भिः पताकाचैलतोरणैः॥ ३३10.42.33

तेषु पौरा जानपदा ब्रह्मक्षत्रपुरोगमाः।

यथोपजोषं विविशू राजानश्‍च कृतासनाः॥ ३४10.42.34

कंसः परिवृतोऽमात्यै राजमंच उपाविशत्।

मण्डलेश्‍वरमध्यस्थो हृदयेन विदूयता॥ ३५10.42.35

वाद्यमानेषु तूर्येषु मल्लतालोत्तरेषु च।

मल्लाः स्वलंकृता दृप्ताः सोपाध्यायाः समाविशन्॥ ३६ 10.42.36

पृष्ठ 397

चाणूरो मुष्टिकः कूटः शलस्तोशल एव च।

त आसेदुरुपस्थानं वल्गुवाद्यप्रहर्षिताः॥ ३७10.42.37

नन्दगोपादयो गोपा भोजराजसमाहुताः।

निवेदितोपायनास्ते एकस्मिन् मंच आविशन्॥ ३८10.42.38

पृष्ठ 396

परीक्षित्! जब रात बीत गयी और सूर्यनारायण पूर्व समुद्रसे ऊपर उठे, तब राजा कंसने मल्ल-क्रीड़ा (दंगल)-का महोत्सव प्रारम्भ कराया॥ ३२॥ राजकर्मचारियोंने रंगभूमिको भलीभाँति सजाया। तुरही, भेरी आदि बाजे बजने लगे। लोगोंके बैठनेके मंच फूलोंके गजरों, झंडियों, वस्त्र और बंदनवारोंसे सजा दिये गये॥ ३३॥ उनपर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नागरिक तथा ग्रामवासी—सब यथास्थान बैठ गये। राजालोग भी अपने-अपने निश्‍चित स्थानपर जा डटे॥ ३४॥ राजा कंस अपने मन्त्रियोंके साथ मण्डलेश्‍वरों (छोटे-छोटे राजाओं) के बीचमें सबसे श्रेष्ठ राजसिंहासनपर जा बैठा। इस समय भी अपशकुनोंके कारण उसका चित्त घबड़ाया हुआ था॥ ३५॥ तब पहलवानोंके ताल ठोंकनेके साथ ही बाजे बजने लगे और गरबीले पहलवान खूब सज-धजकर अपने-अपने उस्तादोंके साथ अखाड़ेमें आ उतरे॥ ३६॥ चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल आदि प्रधान-प्रधान पहलवान बाजोंकी सुमधुर ध्वनिसे उत्साहित होकर अखाड़ेमें आ-आकर बैठ गये॥ ३७॥ इसी समय भोजराज कंसने नन्द आदि गोपोंको बुलवाया। उन लोगोंने आकर उसे तरह-तरहकी भेंटें दीं और फिर जाकर वे एक मंचपर बैठ गये॥ ३८॥

पृष्ठ 397

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे
मल्लरंगोपवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४२॥

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