‘सुन्दरी! तुम्हारा घर संसारी लोगोंके लिये अपनी मानसिक व्याधि मिटानेका साधन है। मैं अपना कार्य पूरा करके अवश्य वहाँ आऊँगा। हमारे-जैसे बेघरके बटोहियोंको तुम्हारा ही तो आसरा है’॥ १२॥
एष्यामि ते गृहं सुभ्रूः पुंसामाधिविकर्शनम्।
साधितार्थोऽगृहाणां नः पान्थानां त्वं परायणम्॥ १२
‘सुन्दरी! तुम्हारा घर संसारी लोगोंके लिये अपनी मानसिक व्याधि मिटानेका साधन है। मैं अपना कार्य पूरा करके अवश्य वहाँ आऊँगा। हमारे-जैसे बेघरके बटोहियोंको तुम्हारा ही तो आसरा है’॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.42.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 394) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/42/12/