राजा कंस अपने मन्त्रियोंके साथ मण्डलेश्वरों (छोटे-छोटे राजाओं) के बीचमें सबसे श्रेष्ठ राजसिंहासनपर जा बैठा। इस समय भी अपशकुनोंके कारण उसका चित्त घबड़ाया हुआ था॥ ३५॥
कंसः परिवृतोऽमात्यै राजमंच उपाविशत्।
मण्डलेश्वरमध्यस्थो हृदयेन विदूयता॥ ३५
राजा कंस अपने मन्त्रियोंके साथ मण्डलेश्वरों (छोटे-छोटे राजाओं) के बीचमें सबसे श्रेष्ठ राजसिंहासनपर जा बैठा। इस समय भी अपशकुनोंके कारण उसका चित्त घबड़ाया हुआ था॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.42.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 396) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/42/35/