तब वह बहुत ही डर गया, उस दुर्बुद्धिको बहुत देरतक नींद न आयी। उसे जाग्रत्-अवस्थामें तथा स्वप्नमें भी बहुत-से ऐसे अपशकुन हुए जो उसकी मृत्युके सूचक थे॥ २७॥
दीर्घप्रजागरो भीतो दुर्निमित्तानि दुर्मतिः।
बहून्यचष्टोभयथा मृत्योर्दौत्यकराणि च॥ २७
तब वह बहुत ही डर गया, उस दुर्बुद्धिको बहुत देरतक नींद न आयी। उसे जाग्रत्-अवस्थामें तथा स्वप्नमें भी बहुत-से ऐसे अपशकुन हुए जो उसकी मृत्युके सूचक थे॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.42.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 396) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/42/27/