॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.43.17
मल्लानामशनिर्नृणां नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्
गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः।
मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां
वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रंगं गतः साग्रजः॥ १७
mallānāmaśanirnṛṇāṃ naravaraḥ strīṇāṃ smaro mūrtimān
gopānāṃ svajano'satāṃ kṣitibhujāṃ śāstā svapitroḥ śiśuḥ|
mṛtyurbhojapatervirāḍaviduṣāṃ tattvaṃ paraṃ yogināṃ
vṛṣṇīnāṃ paradevateti vidito raṃgaṃ gataḥ sāgrajaḥ|| 17
अर्थ
जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ रंगभूमिमें पधारे, उस समय वे पहलवानोंको वज्रकठोर शरीर, साधारण मनुष्योंको नर-रत्न, स्त्रियोंको मूर्तिमान् कामदेव, गोपोंको स्वजन, दुष्ट राजाओंको दण्ड देनेवाले शासक, माता-पिताके समान बड़े-बूढ़ोंको शिशु, कंसको मृत्यु, अज्ञानियोंको विराट्, योगियोंको परम तत्त्व और भक्तशिरोमणि वृष्णिवंशियोंको अपने इष्टदेव जान पड़े (सबने अपने-अपने भावानुरूप क्रमशः रौद्र, अद्भुत, शृंगार, हास्य, वीर, वात्सल्य, भयानक, बीभत्स, शान्त और प्रेमभक्तिरसका अनुभव किया)॥ १७॥