राजन्! वैसे तो कंस बड़ा धीर-वीर था; फिर भी जब उसने देखा कि इन दोनोंने कुवलयापीडको मार डाला, तब उसकी समझमें यह बात आयी कि इनको जीतना तो बहुत कठिन है। उस समय वह बहुत घबड़ा गया॥ १८॥
हतं कुवलयापीडं दृष्ट्वा तावपि दुर्जयौ।
कंसो मनस्व्यपि तदा भृशमुद्विविजे नृप॥ १८
राजन्! वैसे तो कंस बड़ा धीर-वीर था; फिर भी जब उसने देखा कि इन दोनोंने कुवलयापीडको मार डाला, तब उसकी समझमें यह बात आयी कि इनको जीतना तो बहुत कठिन है। उस समय वह बहुत घबड़ा गया॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.43.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 399) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/43/18/