श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.43.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 43 · अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

हतं कुवलयापीडं दृष्ट्वा तावपि दुर्जयौ।

कंसो मनस्व्यपि तदा भृशमुद्विविजे नृप॥ १८

hataṃ kuvalayāpīḍaṃ dṛṣṭvā tāvapi durjayau|

kaṃso manasvyapi tadā bhṛśamudvivije nṛpa|| 18

अर्थ

राजन्! वैसे तो कंस बड़ा धीर-वीर था; फिर भी जब उसने देखा कि इन दोनोंने कुवलयापीडको मार डाला, तब उसकी समझमें यह बात आयी कि इनको जीतना तो बहुत कठिन है। उस समय वह बहुत घबड़ा गया॥ १८॥

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