॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.43.22
ऊचुः परस्परं ते वै यथादृष्टं यथाश्रुतम्।
तद्रूपगुणमाधुर्यप्रागल्भ्यस्मारिता इव॥ २२
ūcuḥ parasparaṃ te vai yathādṛṣṭaṃ yathāśrutam|
tadrūpaguṇamādhuryaprāgalbhyasmāritā iva|| 22
अर्थ
उनके सौन्दर्य, गुण, माधुर्य और निर्भयताने मानो दर्शकोंको उनकी लीलाओंका स्मरण करा दिया और वे लोग आपसमें उनके सम्बन्धकी देखी-सुनी बातें कहने-सुनने लगे॥ २२॥