॥ श्रीहरिः ॥
निःसारयत दुर्वृत्तौ वसुदेवात्मजौ पुरात्।
धनं हरत गोपानां नन्दं बध्नीत दुर्मतिम्॥ ३२
niḥsārayata durvṛttau vasudevātmajau purāt|
dhanaṃ harata gopānāṃ nandaṃ badhnīta durmatim|| 32
अर्थ
‘अरे, वसुदेवके इन दुश्चरित्र लड़कोंको नगरसे बाहर निकाल दो। गोपोंका सारा धन छीन लो और दुर्बुद्धि नन्दको कैद कर लो॥ ३२॥
निःसारयत दुर्वृत्तौ वसुदेवात्मजौ पुरात्।
धनं हरत गोपानां नन्दं बध्नीत दुर्मतिम्॥ ३२
‘अरे, वसुदेवके इन दुश्चरित्र लड़कोंको नगरसे बाहर निकाल दो। गोपोंका सारा धन छीन लो और दुर्बुद्धि नन्दको कैद कर लो॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 405) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/32/