वसुदेव भी बड़ा कुबुद्धि और दुष्ट है। उसे शीघ्र मार डालो और उग्रसेन मेरा पिता होनेपर भी अपने अनुयायियोंके साथ शत्रुओंसे मिला हुआ है। इसलिये उसे भी जीता मत छोड़ो’॥ ३३॥
वसुदेवस्तु दुर्मेधा हन्यतामाश्वसत्तमः।
उग्रसेनः पिता चापि सानुगः परपक्षगः॥ ३३
वसुदेव भी बड़ा कुबुद्धि और दुष्ट है। उसे शीघ्र मार डालो और उग्रसेन मेरा पिता होनेपर भी अपने अनुयायियोंके साथ शत्रुओंसे मिला हुआ है। इसलिये उसे भी जीता मत छोड़ो’॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 405) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/33/