श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ही सारे संसारके जीवनदाता हैं। उन्होंने रानियोंको ढाढ़स बँधाया, सान्त्वना दी; फिर लोकरीतिके अनुसार मरनेवालोंका जैसा क्रिया-कर्म होता है, वह सब कराया॥ ४९॥✎ 1673
राजयोषित आश्वास्य भगवाँल्लोकभावनः।
यामाहुर्लौकिकीं संस्थां हतानां समकारयत्॥ ४९
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ही सारे संसारके जीवनदाता हैं। उन्होंने रानियोंको ढाढ़स बँधाया, सान्त्वना दी; फिर लोकरीतिके अनुसार मरनेवालोंका जैसा क्रिया-कर्म होता है, वह सब कराया॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 407) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/44/49/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)