तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने जेलमें जाकर अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ाया और सिरसे स्पर्श करके उनके चरणोंकी वन्दना की॥ ५०॥✎ 1919
मातरं पितरं चैव मोचयित्वाथ बन्धनात्।
कृष्णरामौ ववन्दाते शिरसाऽऽस्पृश्य पादयोः॥ ५०
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने जेलमें जाकर अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ाया और सिरसे स्पर्श करके उनके चरणोंकी वन्दना की॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 407) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/44/50/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1919 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): बल-रामजीने → बलरामजीने